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Shiv Shankar Mahadev : विस्तृत जानकारी

Shiv Shankar Mahadev : विस्तृत जानकारी

भोले बाबा के भगतो को प्रणाम

अगर आप हमारे इस लेख तक पहुँच गए है तो आप जरूर बाबा जी के बारे में और ज्ञान प्राप्त करने के इच्छुक है।  पर भोले बाबा जी का ज्ञान कभी ना ख़तम होने वाला जल का श्रोत है , जिसमे जितना अन्दर जाते जाओगे बाबा जी को उतना ही जानते और अपने पास पाओगे।  अगर इस लेख में हमसे कोई भूल हो गयी हो तो हम पहले ही उस के लिए क्षमा प्रार्थी है।  तो आईये शुरू करते है लेके बाबा का नाम।  जय महाकाल, जय महादेव.

जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी

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Shiv Shankar Mahadev : विस्तृत जानकारी



    शिव परिचय

    शिव हिन्दू धर्म या सनातन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में एक है। वह त्रिदेवों (ब्रम्हा विष्णु महेश ) में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, महाकाल, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधर आदि नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है।


    हिन्दू शिव-धर्म के प्रमुख देवताओं में से।वेदों में शिव को रुद्र के नाम से सम्भोदित किया गया है। शिव हर जीवित प्राणी की चेतना के अन्तर्यामी हैं। शिव की पत्नी (शक्ति) का नाम पार्वती है। उनके दो बेटे नाम कार्तिकेय और गणेश हैं, और एक  पुत्री नाम अशोक सुंदरी हैं। शिव को ज्यादातर चित्रों में योगी के रूप में ही दिखाया जाता है , उनकी पूजा मूर्ति और शिवलिंग दोनों ही स्वरूपों में की जाती है। शिव का स्वरूप बयां करें तो सर पर बालों में गंगा और अर्ध चन्द्रमा माथे पर तीसरी आंख कानों में कुण्डल शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं।हिन्दू धर्म के अनुसार कैलाश पर्वत को शिव का निवास स्थान माना गया है।
    शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंकर जी भोलेपन और रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। इस पुरे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, स्थिति और संहार सब शिव ही करते है । त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि और सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय और प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।

     रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि उनके भक्त हुए हैं। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिए उन्हें महादेव ने कहा है। शिव के कुछ प्रचलित नाम, महाकाल, आदिदेव, किरात, शंकर, चन्द्रशेखर, जटाधारी, नागनाथ, मृत्युंजय, त्रयम्बक, महेश, विश्वेश, महारुद्र, विषधर, नीलकंठ, महाशिव, उमापति, काल भैरव, भूतनाथ आदि। भगवान शिव को रूद्र नाम से जाना जाता है रुद्र का अर्थ है रुत दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला अतः भगवान शिव का स्वरूप कल्याण कारक है रुद्राष्टाध्याई के पांचवी अध्याय में भगवान शिव के कई रूप वर्णन है रूद्र देवता को स्थावर जंगम सर्व पदार्थ रूप सर्व जाति मनुष्य देव पशु वनस्पति रूप मानकर के सराव अंतर्यामी भाव और सर्वोत्तम भाव सिद्ध किया गया है इस भाव से ज्ञात हुए साधक सवाई है।

    रामायण में भगवान राम के कथन अनुसार शिव और राम में अंतर जानने वाला कभी भी भगवान शिव का या भगवान राम का प्रिय नहीं हो। शुक्ल यजुर्वेद संहिता के अंतर्गत रुद्र अष्टाध्याई के अनुसार सूर्य इंद्र विराट पुरुष हरे वृक्ष अन्न जल वायु एवं मनुष्य के मनुष्य के कल्याण के सभी हेतु भगवान शिव के ही स्वरूप है भगवान सूर्य के रूप में वह शिव भगवान मनुष्य के कर्मों-भली-भक्ति के दर्शन करते हैं। उन्हें वैसा ही फल देते हैं आशय यह है कि संपूर्ण सृष्टि शिवमय है मनुष्य अपने अपने कर्मानुसार फल पाते हैं। अर्थात स्वस्थ बुद्धि वालों को वृष्टि जल अन्य आदि भगवान शिव प्रदान करते हैं और दुर्बुद्धि लोग को व्याधि दुख और मृत्यु आदि का विधान भी शिवजी करते हैं।

    शिव अनादि है। 

    जिस प्रकार इस ब्रह्मण्ड का ना कोई अंत है, न कोई छोर और न ही कोई सुरुआत, उसी प्रकार शिव अनादि है सम्पूर्ण ब्रह्मांड शिव के अंदर समाया हुआ है जब कुछ नहीं था तब भी शिव थे जब कुछ न होगा तब भी शिव ही होंगे।

     शिव को महाकाल कहा जाता है, अर्थात समय। शिव अपने इस स्वरूप द्वारा पूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करते हैं। इसी स्वरूप द्वारा परमात्मा ने अपने ओज व उष्णता की शक्ति से सभी ग्रहों को एकत्रित कर रखा है। परमात्मा का यह स्वरूप अत्यंत ही कल्याणकारी माना जाता है क्योंकि पूर्ण सृष्टि का आधार इसी स्वरूप पर टिका हुआ है।

    शिव पुराण

    पवित्र शिव पुराण एक लेख के अनुसार , शिव जी ने देवी दुर्गा जी से कहा कि हे मात ब्रह्मा तुम्हारी सन्तान है तथा विष्णु की उतप्पति भी आप से हुई है तो उनके बाद उतपन्न होने वाला में भी आपकी सन्तान हुआ।

    शिव शंकर का व्यक्तित्व

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    Shiv Shankar Image

    शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।

    शिवरात्रि का पूजन


    शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, पुष्प, चन्दन का स्नान प्रिय हैं। इनकी पूजा के लिये दूध, दही, घी, शकर, शहद इन पांच अमृत जिसे पञ्चामृत कहा जाता है, से की जाती है। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबंधित हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।

    शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग और उनका महत्व 

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    Shiv Shankar Jyotirlinga

    हिन्दू धर्म में पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। ये संख्या में 12 है।

    सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ,
    श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन,
    उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल,
    ॐकारेश्वर अथवा ममलेश्वर,
    परली में वैद्यनाथ,
    डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशंकर,
    सेतुबंध पर श्री रामेश्वर,
    दारुकावन में श्रीनागेश्वर,
    वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ,
    गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर,
    हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और
    शिवालय में श्रीघृष्णेश्वर।

    हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।

    सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। :उज्जयिन्यां महाकालमोंकारममलेश्वरम्॥१॥
    परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्।:सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥२॥ 
    वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।:हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये॥३॥
    एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रात: पठेन्नर:।:सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥

    12 ज्योतिर्लिंगों के नाम शिव पुराण अनुसार

    1- सोमनाथ ज्योतिर्लिंग

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    Somnath Jyotirlinga

    सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। शिवपुराण के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग होने का श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है।

    2 - मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

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    Mallikarjuna Jyotirlinga

    यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

    एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।

    3- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

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    Mahakaleshwar Jyotirlinga

    यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैन वासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

    4 - ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

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    Omkareshwar Jyotirlinga

    ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

    5 - केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

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    Kedarnath Jyotirlinga

    केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

    6 - भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

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    Bhimshankar Jyotirlinga

    भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

    7 - काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग

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    Kashi Vishwanath Jyotirlinga

    विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे।

    8 - त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

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    Trimbakeshwar Jyotirlinga

    यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरूहोती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।

    9 - वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

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    Vaidyanath Jyotirlinga

    श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखण्ड प्रान्त, पूर्व में बिहार प्रान्त के संथाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है।

    10 - नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

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    Nageshwar Jyotirlinga

    यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

    11- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

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    Rameswaram Jyotirlinga

    यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथ पुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।

    12 - घृष्णेश्वर मन्दिर ज्योतिर्लिंग

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    Grishneshwar Jyotirlinga

    घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के संभाजीनगर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

    भगवान शिव के 108 नाम

    1. ॐ भोलेनाथ नमः
    2. ॐ कैलाश पति नमः
    3. ॐ भूतनाथ नमः
    4. ॐ नंदराज नमः
    5. ॐ नन्दी की सवारी नमः
    6. ॐ ज्योतिलिंग नमः
    7. ॐ महाकाल नमः
    8. ॐ रुद्रनाथ नमः
    9. ॐ भीमशंकर नमः
    10. ॐ नटराज नमः
    11. ॐ प्रलेयन्कार नमः
    12. ॐ चंद्रमोली नमः
    13. ॐ डमरूधारी नमः
    14. ॐ चंद्रधारी नमः
    15. ॐ मलिकार्जुन नमः
    16. ॐ भीमेश्वर नमः
    17. ॐ विषधारी नमः
    18. ॐ बम भोले नमः
    19. ॐ ओंकार स्वामी नमः
    20. ॐ ओंकारेश्वर नमः
    21. ॐ शंकर त्रिशूलधारी नमः
    22. ॐ विश्वनाथ नमः
    23. ॐ अनादिदेव नमः
    24. ॐ उमापति नमः
    25. ॐ गोरापति नमः
    26. ॐ गणपिता नमः
    27. ॐ भोले बाबा नमः
    28. ॐ शिवजी नमः
    29. ॐ शम्भु नमः
    30. ॐ नीलकंठ नमः
    31. ॐ महाकालेश्वर नमः
    32. ॐ त्रिपुरारी नमः
    33. ॐ त्रिलोकनाथ नमः
    34. ॐ त्रिनेत्रधारी नमः
    35. ॐ बर्फानी बाबा नमः
    36. ॐ जगतपिता नमः
    37. ॐ मृत्युन्जन नमः
    38. ॐ नागधारी नमः
    39.  ॐ रामेश्वर नमः
    40. ॐ लंकेश्वर नमः
    41. ॐ अमरनाथ नमः
    42. ॐ केदारनाथ नमः
    43. ॐ मंगलेश्वर नमः
    44. ॐ अर्धनारीश्वर नमः
    45. ॐ नागार्जुन नमः
    46. ॐ जटाधारी नमः
    47. ॐ नीलेश्वर नमः
    48. ॐ गलसर्पमाला नमः
    49.  ॐ दीनानाथ नमः
    50. ॐ सोमनाथ नमः
    51. ॐ जोगी नमः
    52. ॐ भंडारी बाबा नमः
    53. ॐ बमलेहरी नमः
    54. ॐ गोरीशंकर नमः
    55. ॐ शिवाकांत नमः
    56. ॐ महेश्वराए नमः
    57. ॐ महेश नमः
    58. ॐ ओलोकानाथ नमः
    59. ॐ आदिनाथ नमः
    60. ॐ देवदेवेश्वर नमः
    61. ॐ प्राणनाथ नमः
    62. ॐ शिवम् नमः
    63. ॐ महादानी नमः
    64. ॐ शिवदानी नमः
    65. ॐ संकटहारी नमः
    66. ॐ महेश्वर नमः
    67. ॐ रुंडमालाधारी नमः
    68. ॐ जगपालनकर्ता नमः
    69. ॐ पशुपति नमः
    70. ॐ संगमेश्वर नमः
    71. ॐ दक्षेश्वर नमः
    72. ॐ घ्रेनश्वर नमः
    73. ॐ मणिमहेश नमः
    74. ॐ अनादी नमः
    75. ॐ अमर नमः
    76. ॐ आशुतोष महाराज नमः
    77. ॐ विलवकेश्वर नमः
    78. ॐ अचलेश्वर नमः
    79. ॐ अभयंकर नमः
    80. ॐ पातालेश्वर नमः
    81. ॐ धूधेश्वर नमः
    82. ॐ सर्पधारी नमः
    83. ॐ त्रिलोकिनरेश नमः
    84. ॐ हठ योगी नमः
    85. ॐ विश्लेश्वर नमः
    86.  ॐ नागाधिराज नमः
    87.  ॐ सर्वेश्वर नमः
    88. ॐ उमाकांत नमः
    89. ॐ बाबा चंद्रेश्वर नमः
    90. ॐ त्रिकालदर्शी नमः
    91. ॐ त्रिलोकी स्वामी नमः
    92. ॐ महादेव नमः
    93. ॐ गढ़शंकर नमः
    94. ॐ मुक्तेश्वर नमः
    95. ॐ नटेषर नमः
    96. ॐ गिरजापति नमः
    97. ॐ भद्रेश्वर नमः
    98. ॐ त्रिपुनाशक नमः
    99. ॐ निर्जेश्वर नमः
    100. ॐ किरातेश्वर नमः
    101. ॐ जागेश्वर नमः
    102. ॐ अबधूतपति नमः
    103. ॐ भीलपति नमः
    104. ॐ जितनाथ नमः
    105. ॐ वृषेश्वर नमः
    106. ॐ भूतेश्वर नमः
    107. ॐ बैजूनाथ नमः
    108. ॐ नागेश्वर नमः

    शिव के नंदी गण के नाम 

    • नंदी
    • भृंगी
    • रिटी
    • टुंडी
    • श्रृंगी
    • नन्दिकेश्वर
    • बेताल
    • पिशाच
    • तोतला
    • भूतनाथ

    शिव की अष्टमूर्ति


    1. क्षितिमूर्ति -सर्व

    2. जलमूर्ति -भव
    3. अग्निमूर्ति -रूद्र
    4. वायुमूर्ति -उग्र
    5. आकाशमूर्ति -भीम
    6. यजमानमूर्ति -पशुपति     . 
    7.चन्द्रमूर्ति -महादेव
    8. सूर्यमूर्ति -ईशान

    कैलाश मानसरोवर 

    कुछ कथाओं के अनुसार कैलाश सरोवर को शिव का निवास स्थान माना जाता है।

    भगवान शिव के अनेक अवतार है प्रलयकाल के समय इनका अवतार निराकार ब्रह्मम जिसे कि उत्तराखण्ड में निरंकारदेवता के नाम से भी पूजा जाता है एक ऐसा हि अन्य अवतार है भैरवनाथ अवतार जिसे भैरवबाबा के नाम से पूजा जाता है

    सावन का महीना और शिव शंकर 

    हिंदू परंपराओं के अनुसार, श्रावण हिंदू चंद्र कैलेंडर का पांचवा महीना है और यह भगवान शिव और देवी पार्वती को समर्पित है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने समुद्र मंथन या विश्व को बचाने के लिए अमृत पाने के लिए ब्रह्मांडीय समुद्र के मंथन के रूप में विष पिया था। माना जाता है कि देवी पार्वती ने उस समय शिव जी की गर्दन पकड़कर विष को शरीर में प्रवेश करने से रोक दिया था।शंकर जी की  गर्दन नीली हो गई और उसने आगे चलकर दर्द और जलन की। कृतज्ञता के एक संकेत के रूप में, उनके भक्त अपने घावों को ठीक करने में मदद करने के लिए गंगा नदी से पानी की पेशकश करते हैं।

    भक्त भी पवित्र महीने के दौरान सोमवार को उपवास करते हैं जिसे श्रवण सोमवर व्रत के रूप में जाना जाता है। उपवास को भगवान को धन्यवाद देने के साथ-साथ सफलता, विवाह और समृद्धि के लिए भी रखा जाता है। भक्त तेजी से निरीक्षण करते हैं और दूध, पानी और बिल्व के पत्तों को अर्पित करते हैं। कुछ लोग मंगलवार को उपवास करते हैं, जिसे 'मंगला गौरी व्रत' के नाम से जाना जाता है।

    श्रावण या सावन का पूरा महीना बहुत ही शुभ होता है और निम्नलिखित का पालन करना भगवान शिव के आशीर्वाद से बहुत अच्छे परिणाम दे सकता है:

    यदि संभव हो तो, व्यक्ति को श्रावण मास के सभी दिनों में उपवास रखना चाहिए। वह प्रतिदिन स्नान करने के बाद भगवान शिव के मंदिर में जाना चाहिए और भगवान शिव को बिल्व पत्र के साथ-साथ पंचामृत (5 वस्तुओं से बनी विशेष सामग्री, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) चढ़ाएं। एक व्यक्ति दूध और दूध की तैयारी, फलों और अन्य वस्तुओं का सेवन कर सकता है जो कि उपवास के दौरान उपयोग किए जाते हैं और भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं।

    यदि प्रतिदिन उपवास संभव नहीं है, तो कम से कम प्रत्येक व्यक्ति को श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को व्रत रखना चाहिए। इस महीने में रुद्राक्ष धारण करना भी बहुत शुभ माना जाता है।

    व्यक्ति को यथासंभव अधिक से अधिक बार महा मृत्युंजय मंत्र का पाठ करना चाहिए।

    शिव शंकर महादेव की आरती

    ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
    ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
    हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 
    दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
    त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
    त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
    सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।
    सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
    मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
    पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
    भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥

    जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
    शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
    नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥ 

    त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
    कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
    ॐ जय शिव ओंकारा॥
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